बचपन
एक दिन अजब दास्तान हुई सोते सोते
अपने ही बचपन मे पहुँच गया मैं रोते रोते
वो गली,वो मकान ,वो दुकान सब धुन्दला से दिखा मुझे
जहाँ पहुँचा करते थे हम जेब मे पैसे खोते खोते।
मैं देख रहा था बहुत कुछ उस सपने में
माँ ने लपेट रखा था मुझे आँचल अपने में
पछताने लगा मैं अपनी सफलता भरी जवानी पर
कोई मज़ा नही लाख रुपये का जो मज़ा था माँ से लेकर एक रुपया रखने में
परेशानियां बचपन से ही बहुत झेल रहे थे
क्या सुंदर दृश्य था वो जब पापा मेरे साथ बैट बॉल खेल रहे थे
वो बचपन का सपना ज़िन्दगी में रंगों की छटा छोड़ रहा था
खुशनसीब थे हम जो अपनी आँखों से ये मंजर देख रहे थे।
जब आँख खुली तो बिस्तर पर सो रहे थे
हल्की आँखों से मानो बचपन मे अभी भी रो रहे थे
पंक्तियां पढ़ते हुए मुझे ये विश्वास हो रहा है
आपको भी अपने बचपन का एहसास हो रहा है
खो दिया हमने बहुत कुछ बड़े होते होते
एक दिन अजब दास्तान हुई सोते सोते
एक दिन अजब दास्तान हुई सोते सोते।
Fabulous 👏👏👏👏
ReplyDeleteThank you
DeleteBahut badhiya Bhai... Rula diya tumne to
ReplyDeleteWow.
ReplyDeleteThank you
DeleteBahut hi simple but real.
ReplyDeleteThank you
DeleteWonderful feeling I feel ye kavita padte-padte
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